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Valmiki Ramayan Sunderkanda Sarg 2 Shlok 1-45 in sanskrit hindi अपने बल पराक्रम से महाबली हनुमान जी ने अपार समुद्र को पार कर और सावधान होकर, त्रिकूटपर्वत पर बसी हुई लडापुरी को देखा

Valmiki Ramayan Sunderkanda Sarg 2, Shlok 1-45 in sanskrit hindi, वाल्मीकि रामायण सुंदरकांड द्वितीयः सर्गः श्लोक १ से ४५,  अपने बल पराक्रम से महाबली हनुमान जी ने अपार समुद्र को नांघ कर और सावधान होकर, त्रिकूटपर्वत पर बसी हुई लडापुरी को देखा, ravan ki sone ki lanka,



सोने की लंका का वर्णन

स सागरमनाधृष्यमतिक्रम्य महाबलः । त्रिकूट शिखरेलकां स्थितां स्वस्थो ददर्श ह ॥१॥ 

अपने बल पराक्रम से महाबली हनुमान जी ने अपार समुद्र को नांघ कर और सावधान होकर, त्रिकूटपर्वत पर बसी हुई लडापुरी को देखा ॥ १॥ उस पर्वत पर जो फूले हुए वृक्ष थे, वे पवन के वेग से हिलने लगे। उनके हिलने से फूल टूट टूट कर गिरने लगे , उन वृक्षों की पुष्प वर्षा से वीर्यवान हनुमान जी मानों पुष्पमय हो गये ॥२॥ 


योजनानां शतं श्रीमांस्तीत्वाप्यमितविक्रमः । अनिःश्वसन्कपिस्तत्र न ग्लानिमधिगच्छति ॥३॥ 

शोभावान् एवं अमित विक्रमशाली हनुमान जी इतने चौड़े अर्थात् १०० योजन के समुद्र को फाँद आये, किन्तु न तो उन्होंने बीच में कहीं दम ली और न उनके मन में ग्लानि ही उपजी ॥३॥ 


शतान्यहं योजनानां क्रमेयं सुबहून्यपि । किं पुनः सागरस्यान्तं संख्यातं शतयोजनम् ॥ ४॥ 

हनुमान जी मन ही मन कहने लगे कि, इस शत योजन मर्यादा वाले समुद्र की तो बात ही क्या है ; मैं तो बहुत से और सैकड़ों योजन मर्यादा वाले समुद्रों को फांद सकता हूँ॥४॥ 


Valmiki-ramayan-underkanda-dusra-sarg-shlok-1-45-in-sanskrit-hindi-hanuman-ji-ka-maha-bal-prakram-samundra-paar-karna


स तु वीर्यवतां श्रेष्ठः प्लवतामपि चोत्तमः। जगाम वेगवॉल्लङ्कां लङ्घयित्वा महोदधिम् ॥ ५॥ 

इस प्रकार मन ही मन सोचते विचारते श्रेष्ठ वीर्यवान्, कपियों में मुख्य, महावेगवान् हनुमान जी समुद्र को फाँद कर लङ्का में गये ॥ ५ ॥ 


शाद्वलानि च नीलानि गन्धवन्ति वनानि च ।। पुष्पवन्ति च मध्येन जगाम नगवन्ति च ॥६॥ 
शैलांश्च तिरुभिश्छन्नान्वनराजीश्च पुष्पिताः । अभिचक्राय तेजस्वी हनुमान्प्लवगर्षभः॥ ७॥ 

वानरोत्तम तेजस्वी हनुमान जी, रास्ते में हरी हरी घासों और सुगन्ध युक्त मधु से भरे और सुन्दर वृक्षों से शोभित वनों और वृक्षों से आच्छादित पर्वतों और पुष्पित वृक्षों से पूर्ण वनों में हो कर जा रहे थे ॥६॥७॥ 


स तस्मिन्नचले तिष्ठन्वनान्युपवनानि च । स नगाग्रे च तां लङ्कां ददर्श पवनात्मजः ॥ ८॥ 

जब पवननन्दन हनुमान जी ने उस पहाड़ पर खड़े हो कर देखा, तब उन्हें वन उपवन तथा पर्वतशिखर पर बसी हुई लङ्का देख पड़ी ॥८॥  वनों में उन्हें देवदारु, कर्णिकार, पुष्पित खजूर, चिरौंजी, खिन्नी, महुश्रा, केतकी, ॥९॥ 


प्रियङगुन्गन्धपूर्णाश्च नीपान्सप्तच्छदांस्तथा । असनान्कोविदारांश्च करवीरांश्च पुष्पितान् ॥१०॥ 
सुगन्धित प्रियंगु, कंदव, शतावरी, असन, कोविदार और फूले हुए करवीर के वृक्ष देख पड़े ॥ १० ॥ 
पुष्पभारनिबद्धांश्च तथा मुकुलितानपि । पादपान्विहगाकीर्णान्पवनाधूतमस्तकान् ॥ ११ ॥ 


इन वृक्षों में से बहुत से तो फूलों से लदे थे और बहुतों में कलियां लगी हुई थीं। उन पर झंड के झुंड पक्षी बैठे हुए थे। उन वृक्षों की फुनगियाँ पवन के चलने से हिल रही थीं ॥ ११ ॥ 


हंसकारण्डवाकीर्णा वापीः पद्मोत्पलायुताः । आक्रीडान्विविधानरम्यान्विविधांश्च जलाशयान् ॥१२॥ 

वहाँ बावलियां भी थीं, जिनमें हंस और जलमुर्ग खेल रहे थे और कमल तथा कुई के फूल फूल रहे थे । वहाँ पर राजाओं के विहार करने की रमणीक तरह तरह की वाटिकाएँ थीं, जिनके भीतर विविध श्राकार प्रकार के जल के कुण्ड बने हुए थे ॥१२॥ 


सन्ततान्विविधैः सर्वर्तुफलपुष्पितैः । उद्यानानि च रम्याणि ददर्श कपिकुञ्जरः ॥१३॥ 

सब ऋतुओं में फलने फूलने वाले अनेक प्रकार के वृक्षों से युक्त वहाँ रमणीक वाटिकाएँ भी हनुमान जी ने देखीं ॥ १३ ॥ 


समासाद्य च लक्ष्मीवॉल्लङ्कां रावणपालिताम् । परिखाभिः सपद्माभिः सोत्पलाभिरलङकृताम् ॥ १४॥ 


शोभायुक्त हनुमान जी अब रावणपालित लङ्का के समीप पहुँचे । लङ्कापुरी फूले कमलों तथा कुई से युक्त परिखा से घिरी हुई थी ॥ १४॥ जब से रावण सीता को हर कर लाया था, तब से लङ्का की विशेष रूप से निगरानी करने के लिये कामरूपी राक्षस लङ्का के चारों ओर घूम घूम कर पहरा दिया करते थे । ( हनुमान जी ने इन पहरुए राक्षसों को भी देखा  ॥ १५ ॥ 


काञ्चनेनावृतां रम्यां प्राकारेण महापुरीम् । गृहेश्च गिरिसङ्काशैः शारदाम्बुदसन्निभैः ॥१६॥ 

लङ्का पुरी के चारो ओर बड़ा सुन्दर सोने का परकोटा खिंचा हुआ था। उसके भीतर शरत्कालीन मेघों के समान सफेद और पहाड़ों की तरह ऊँचे ऊँचे अनेक मकान बने हुए थे ॥ १६ ॥ 


पाण्डुराभिः १प्रतोलोभिः श्लिष्टाभिरभिसंताम् । अट्टालकशताकी पताकाध्वजमालिनीम् ॥ १७॥ 

लङ्का में सफेद गच की हुई पक्की और साफ सुथरी गलियाँ थी। सैकड़ों घटारियांदार मकान थे और जगह जगह ध्वजा पता काएँ फहरा रही थीं ॥ २७॥ 


सुन्दरकाण्ड सर्ग 1 श्लोक 1-40,
सुन्दरकाण्ड सर्ग 1 श्लोक 44-77,
प्रथम सर्ग 78 से 117,
Sarg shlok 139 se 161 in hindi,
श्लोक १६२ से २१०,


तौरणैः काञ्चनैर्दीप्तां २लतापङ्क्तिविचित्रितैः । ददर्श हनुमाँल्लङ्कां दिवि देवपुरीमिव ॥ १८॥ 

वहाँ चमचमातो हुई सौने को लताकार रेखा जैलो रंग विरंगो बंदनवारें देख पड़ती थीं। हनुमान जी ने देवताओं की अमरावती पुरी की तरह सुन्दर सजो हुई लङ्का की शोभा देखी ॥ १८ ॥


गिरिमूनि स्थितां लङ्कां पाण्डुरैर्भवनैः शुभाम् । सि ददर्श कपिः श्रीमान्पुरमाकाशगं यथा ॥ १९ ॥

शोभायुक्त हनुमान जी ने त्रिकूटाचल पर्वत पर बसी हुई असंख्य सफेद रंग के सुन्दर मनोहर भवनों से युक्त आकाश स्पर्शी लङ्कापुरी को देखा (अथवा लङ्का ऐसी जान पड़ती थी मानों अन्तरिक्ष में बसी हो)॥ १९ ॥ 


पालितां राक्षसेन्द्रेण निर्मितां विश्वकर्मणा। प्लवमानामिवाकाशे ददर्श हनुमानपुरीम् ॥ २० ॥ 

लङ्कापुरी का शासन रावण के हाथ में था और विश्वकर्मा ने इस पुरी को बनाया था । हनुमान जी ने देखा कि, उसके भीतर जो ऊँचे ऊँचे भवन खड़े थे, उनको देखने से ऐसा जान पड़ता, मानों वह पुरी आकाश में उड़ी जाती हो ॥ २० ॥ 


वप्रपाकारजघनां विपुलाम्बुनवाम्बराम् । शतघ्नीशूलकेशान्तामट्टालकवतंसकाम् ॥ २१ ॥ 

लङ्का की परकोटे की दीवालें तो लङ्का रूपिणी स्त्रो को मानों जांघे हैं, उसके चारों ओर जो बन और समुद्र था, वह मानों उसके पहिनने के वस्त्र थे। शतघ्नो ( तोपे) और त्रिशूल मानों उसके मस्तक के केश थे और उसको जो अटारियां थीं, वे मानों उसके कानों के कर्णफूल थे ॥२१॥ 


मनसेव कृतां लङ्कां निर्मितां विश्वकर्मणा । द्वारमुत्तरमासाद्य चिन्तयामास वानरः ॥२२॥ 

इस प्रकार की लङ्कापुरी को विश्वकर्मा ने बड़े मन से अर्थात् जी लगा कर बनाया था। जब हनुमान जी लङ्का के उत्तर दिशा वाले फाटक पर पहुँचे, तब वे मन ही मन कहने लगे ॥ २२ ॥ 


कैलासशिखर प्रख्यरालिखन्तीमिवाम्बरम । ध्रियमाणमिवाकाशमुच्छितैर्भवनोत्तमैः ॥२३॥ 

लङ्का का उत्तर का फाटक भी कैलास के सदृश श्राकाश स्पर्शी था । ऐसा जान पड़ता था, मानों उसके ऊँचे ऊँचे मकान आकाश को सहारा देने वाले खंभे हैं। श्रथवा वे ऊँचे मकान आकाश को धारण किये हुए हैं ॥ २३॥ 


 वाल्मीकि रामायण सुंदरकांड द्वितीयः सर्गः श्लोक २४ से ४५
सोने की लंका का वर्णन, Sunderkand sanskrit hindi 24-45



सम्पूर्णा राक्षसैघोरै गर्भोगवतीमिव ॥ २४ ॥ 

हनुमान जी कहने लगे कि, जिस प्रकार भागवतीपुरी नागों से भरी है, उसी प्रकार यह लङ्का भी राक्षसों से भरी हुई है ॥२४॥ 


रावणं च रिपं घोरं चिन्तयामास वानरः॥ २५ ॥

हनुमान जी ने देखा कि, लङ्का को भली भांति रक्षा तो समुद्र ही कर रहा है। साथ ही हनुमान जी ने यह भी सोचा कि, रावण भी एक महाभयङ्कर शत्रु है ॥ २५ ॥ 


आगत्यापीह हरयो भविष्यन्ति निरर्थकाः ।  न हि युद्धेन वै लङ्का शक्या जेतुं सुरासुरैः ॥ २६ ॥ 

यदि वानरगण यहाँ किसी प्रकार भाभी पहुँचे, तो भी उनका यहाँ पाना व्यर्थ होगा। क्योंकि इस लङ्का को जीतने की शक्ति तो देवताओं और दैत्यों में भी नहीं है ॥ २६ ॥ 


इमां तु विषमां दुर्गा लङ्कां रावणपालिताम् । प्राप्यापि स महाबाहुः किं करिष्यति राघवः ॥२७॥

रावणपालित इस विकट दुर्गम लड़ा में श्रीरामचन्द्र जी यदि श्रा भी गये तो, वे कर ही क्या सकेंगे॥ २७॥ 


अवकाशो न सान्त्वस्य राक्षसेष्वभिगम्यते । न दानस्य न भेदस्य नैव युद्धस्य दृश्यते ॥ २८ ॥ 

नेत्र मेरी समझ में तो राक्षस लोग, खुशामद से काबू में आने वाले नहीं। इन लोगों को लालच दिखला कर या इनमें फूट डाल कर अथवा इनसे युद्ध करके भी, इनसे पार नहीं पाया जा सकता ॥२८॥ 


चतुर्णामेव हि गतिर्वानराणां महात्मनाम् । वालिपुत्रस्य नीलस्य मम राज्ञश्च धीमतः ॥ २९ ॥ 

हमारी सेना में चार ही ऐसे जन हैं जो यहाँ पा सकते हैं। एक तो अंगद, दूसरे नील, तीसरा मैं और चौथे बुद्धिमान वानर राज सुग्रीव ॥ २९ ॥ अस्तु, अब सब से प्रथम तो यह जान लेना है कि, जानकी जी जीवित भी हैं कि नहीं । मैं प्रथम जानको जो को देख लेने पर पोछे और बातों की चिन्ता करूँगा ॥ ३०॥ 



ततः स चिन्तयामास मुहूर्त कपिकुञ्जरः । शव गिरिशृङ्गे स्थितस्तास्मिन्रामस्याभ्युदये रतः ॥ ३१ ॥ 

तदनन्तर श्रीरामचन्द्र जी के हित में रत, कपिश्रेष्ठ हनुमान जी पर्वत के शिखर पर बैठे हुए मुहूर्त भर तक मन ही मन सोचते रहे ॥३१॥  


अनेन रूपेण मया न शक्या रक्षसां पुरी। प्रवेष्टुं राक्षसैगुप्ता क्रूरैर्बलसमन्वितैः ॥ ३२ ॥ 

उन्होंने सोचा कि, बलवान तथा क्रूर स्वभाव राक्षसों द्वारा रक्षित लङ्का में मैं अपने इस रूप से प्रवेश नहीं कर सकता ॥ ३२॥ जानकी माता का पता लगाने हेतु मुझे इन दुष्ट राक्षसों के आंखो से बचने हेतु धोखा देना उचित है ॥३३॥ 



लक्ष्यालक्ष्येण रूपेण रात्रौ लङ्कापुरी मया । प्रवेष्टुं प्राप्तकालं मे कृत्यं साधयितुं महत् ॥ ३४ ॥ 

का प्रतः मुझे रात के समय ऐसे रूप से जिसे कोई देखे और कोई न देखे, लङ्का में घुसना उचित है । क्योंकि इतना बड़ा कार्य विना ऐसा किये पूरा नहीं होगा ॥ ३४ ॥ 


तां पुरी तादृशीं दृष्ट्वा दुराधर्षा सुरासुरैः । हनुमांश्चिन्तयामास विनिःश्वस्य मुहुर्मुहुः ॥ ३५ ॥ 
केनोपायेन पश्येयं मैथिली जनकात्मजाम् । अदृष्टो राक्षसेनण रावणेन दुरात्मना ॥ ३६॥ 



इस प्रकार हनुमान जी सुर और असुरों से दुराधर्ष उस लङ्का पुरी को बराबर देखने लगे और बार बार लंबी साँसे ले यह सोचते थे कि, किस उपाय से जनकनन्दिनी जानकी को तो मैं देख लूँ और उस दुरात्मा राक्षसराज रावण की दृष्टि से बचा रहूँ ॥ ३५ ॥ ३६ ॥ 



न विनश्येत्कथं कार्य रामस्य विदितात्मनः । एकामेकस्तु पश्येयं रहिते जनकात्मजाम् ॥ ३७॥ 

तीनों लोकों में प्रसिद्ध श्रीरामचन्द्र जी का कार्य किस प्रकार करूँ जिसले कार्य विगड़ने न पावे । मैं तो अकेला एकान्त में अकेली जानकी को देखना चाहता हूँ ॥ ३७॥ 


भूताश्चार्था विपद्यन्ते देशकालविरोधिताः । विक्लवं दूतमासाद्य तमः सूर्योदये यथा ॥ ३८॥ 

देश और काल के प्रतिकूल कार्य करने वाला और कादर दूत, बने बनाये कार्य को उली प्रकार नष्ट कर डालता है, जिस प्रकार सूर्य अन्धकार को ॥३८॥ 


अर्थानान्तरे बुद्धिनिश्चितापि न शोभते । घातयन्ति हि कार्याणि दूताः पण्डितमानिनः ॥ ३९ ॥ 

कर्त्तव्याकर्त्तव्य के विषय में निश्चित कर लेने पर भी, ऐसे दूतों के कारण कार्य की सिद्धि नहीं होतो । क्योंकि वे अपनी बुद्धि भानो के अभिमान में कार्यों को न बना कर, उन्हें बिगाड़ डालते हैं ॥ ३६॥ 


न विनश्येत्कथं कार्य वैक्लब्यं न कथं भवेत् । लङघनं च समुद्रस्य किथं नु न भवेद्वथा ॥ ४०॥

अतः अब किस उपाय से मैं काम लूँ जिससे न तो कार्य हो बिगड़े, और न मुझमें कादरता आवे । प्रत्युत मेरा समुद्र फाँदना वृथा भी न हो॥४०॥ 


मयि दृष्टे तु रक्षोभी रामस्य विदितात्मनः । भवेद्व्यर्थमिदं कार्य रावणानमिच्छतः ॥४१॥ 

त्रिभुवनविख्यात श्रीरामचन्द्र जो रावण को दण्ड देना चाहते हैं, अतः यदि राक्षसों ने मुझे देख लिया तो श्रीरामचन्द्र जी का यह कार्य बिगड़ जायगा ॥४१॥ 


न हि शक्यं कचित्स्थातुमविज्ञातेन राक्षसैः । अपि राक्षसरूपेण किमुतान्येन केनचित् ॥ ४२ ॥ 

राक्षसों से छिप कर यहां कोई भी नहीं रह सकता। यहाँ तक कि राक्षसों का अथवा अन्य किसी का रूप धारण करने से भी राक्षसों से छुटकारा नहीं हो सकता ॥ ४२ ॥ 


वायुरप्यत्र न ज्ञातश्चरेदिति मतिमम । न ह्यस्त्यविदितं किञ्चिद्राक्षसानां बलीयसाम् ।। ४३ ॥ 

मैं तो समझता हूँ कि, वायु भी यहाँ पर गुप्त रूप से नहीं बह सकता। क्योंकि बलवान राक्षसों से कोई बात छिप नहीं सकती॥४३॥ 


इहाहं यदि तिष्ठामि स्वेन रूपेण संवृतः । विनाशसुपयास्यामि भर्तुरर्थश्च हिास्यते ।। ४४ ॥ 

यदि मैं अपने असली रूप में यहां ठहरा रहूँ तो केवल स्वामी का कार्य ही नष्ट न होगा, वलिक में भी मारा जाऊँगा ॥ ४ ४॥ 


लङ्कामभिगमिष्यामि राघवस्यार्थसिद्धये ॥ ४५ ॥ 

श्रतः मैं अपने शरीर को बहुत ही छोटा बना कर, श्रीरामचन्द्र जी के काम के लिये रात के समय लङ्का में जाऊँगा ॥ ४५ ॥ 

सुन्दरकाण्ड सर्ग 1 श्लोक 1-40,
सुन्दरकाण्ड सर्ग 1 श्लोक 44-77,
प्रथम सर्ग 78 से 117,
Sarg shlok 139 se 161 in hindi,
श्लोक १६२ से २१०,

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