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adi shankaracharya ka janm jivan parichay mukhy updesh awdaitvaad ka sidhant - आदि-शंकराचार्य जी की जीवनी

adi shankaracharya ka janm jivan parichay mukhy updesh awdaitvaad ka sidhant - आदि-शंकराचार्य जी की जीवनी


भारतीय इतिहास के तिथि काल-क्रम की अनेक समस्याओं मे एक अत्यन्त महत्वपूर्ण कालक्रम का सबध महान दार्शनिक आदि श्री शकराचार्य जी से है। महान् विभूति श्री शकराचार्य जी सम्पूर्ण भारत में परम श्रद्धा से विश्व-वद्य हैं क्योकि उनकी अद्वैत-मीमासा भारतीय अध्यात्मविद्या विचार-प्रणाली की विशुद्धतम रूप मानी जाती है। 



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इस महान दार्शनिक ने अनेक पीठ (मठ) स्थापित किये। इनमे से चार पीठो ने परम्परागत रूप में अपने-अपने क्षेत्र में सर्वोच्च धामिक-दानिक सत्ता का उपभोग किया है। ये चार पीठ है उत्तर में बद्री केदार पीठ, पश्चिम मे द्वारिका पीठ, पूर्व में जगन्नाथ पुरी तथा दक्षिण मे शृगेरी पीठ ! पाँववी पीठ-काँचीपुरम में काया विसर्जित होने तक महान् विभूति श्री शंकराजार्य जी द्वारा सुशोभित होती रही। 



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श्री शकराचार्य अत्यल्प जीवी रहे । वे केवल ३२ वर्ष जीवित रहे। किन्तु मूल समस्या यह है कि वे कौनने ३२ वर्ष तक जीवित रहे । भारत में ब्रिटिश लोगो के शासन काल मे जिनका शब्द ही पूर्ण प्रभुत्व रखता था और जो आज भी अति पावन समझा जाता है, आदी शकराचाय जी ईसवा पूर्व ५० से ४७७ की अवधि में इस देश का मार्गदर्शन करते रहे इस विषय पर चिंतन करेंगे।



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जैसा अनेक विद्वानो का मत है ! 

इस विवाद में काल सबधी प्रतिष्ठा का प्रश्न अत्युच्च है। सभी दष्टियो से १२६७ वर्ष की त्रुटि एक अत्यन्त महत्त्व का विषय है क्योकि यह भारतीय इतिहास के समस्त प्राचीन घटनाक्रम में परि वर्तन ला सकता है। इसका कारण यह है कि भारतीय इतिहास मे श्री शकराचार्य जी का स्थान अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। इसलिए प्राव श्यक हो जाता है कि दोनों पक्षो द्वारा प्रस्तुत प्रमाणो का सम्बक विवेचन किया जाय । 



काँचीपुरम स्थित कामकोटिपीठ, adi shankaracharya ka janm jivan parichay mukhy updesh awdaitvaad ka sidhant - आदि-शंकराचार्य जी की जीवनी


जहाँ अपने पर्यटनशील प्राश्र मिक जीवन के पश्चात् श्री शकराचार्य जी स्थायी रूप से निवास करने लगे थे, उनके द्वारा ईसा पूर्व ४८२ में स्थापित हुना था । तब से अद्यतन चले आ रहे अनुवती प्राचार्यों की अविच्छिन्न शृङ्खला इनके पास है। वर्तमान प्राचार्य उस क्रम मे ६८व है। उत्तरा धिकारियो में तीसरे श्री सर्वज्ञात्मन तथा चौथे श्री सत्यबोध क्रमश ११२ और १०४ वर्ष तक धार्मिक व्यवस्था का संचालन करते रहे जबकि ३२वं प्राचार्य श्री चिदानदधन केवल ४ वर्ष ही अधीष्ठिन रहे । ३६वे प्राचार्य श्री चित्सुखानद का कितने समय तक प्रभुत्व रहा, जात प्रतीत नहीं होता क्योकि, यद्यपि उनका नाम सूची मे समाविष्ट है, तथापि उनका कालवड लिखा नहीं है। 


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ईसा पूर्व ४८२ से १९६६ ईसवी तक-२४४८ वर्षों तक शकराचार्यो के रूप मे अधीष्ठित ६८ महानुभावो में से प्रत्येक का औसत कार्यकाल ३६ वर्ष निकलता है जो असभव बात नहीं है, जबकि हमे ज्ञात ही है कि स्थानापन्न प्रत्येक प्राचार्य परम शुद्ध ब्रह्मचारी रहे हैं, जिन्होने तपश्चर्या, सयम, मितव्ययिता एव शुद्धि का आदर्श जीवन व्यतीत किया।  


  1. शृगेरी मठ की एक परम्परा द्वारा प्रतिपादित तीसरा मत यह है कि महान् शकराचार्य जी ईसा पूर्व ४ में विद्यमान थे । 



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अव हम अनन्तश्री विभूषित आदि-शकराचार्य जी के जीवन काल के समय का निर्धारण करने के लिये उपलब्ध साक्ष्य का सम्यक विवेचन करेंगे। 

(१) कम्बोडिया के एक अभिलेख (शिलालेख) में शिवसोम का उल्लेख मिलता है। यह शिवसोम ‘भगवान शकर के शिष्य के रूप मे वणित है। शिवलोम इन्द्रवर्मन का गुरु था । इन्द्रवर्मन ८७८-८८७ ई. के आसपास जीवित रहा, ऐसा ज्ञात है। यह साक्ष्य के रूप में उदधत किया जाता है कि शकराचार्य सन ७६८ से ८२२ ई० तक रहे थे। इस मत को अस्वीकृत करते हुए यह उल्लेख करना समीचीन है कि महान शकराचार्य जी के शिष्यों की सूची में किसी भी शिवसोम का कहीं कोई नाम नहीं है। साथ ही ऐसा प्रतीत होता है कि किसी परवर्ती शकराचार्य की अपेक्षा, शिवसोम का नाम आदि-शंकराचार्य जी के नाम के साथ भूल से जोड़ दिया गया है क्योकि जब से शंकरा चार्यों की पीठ की स्थापना हुई है, तभी से उनको अत्यन्त पूज्य भाव से सम्मानित किया गया है। 



(२) "सौन्दर्य लहरी" नामक एक ग्रथ महान् शकराचार्य जी प्रणीत कहा जाता है । इसके ७५वें पद में 'द्राविड शिशु के रूप में तमिल मत लिरुज्ञान-संबध की ओर सकेत निर्दिष्ट माना जाता है। चूंकि वह सन्य ईसा पश्चात् ७वी शताब्दी में था, इसीलिए तर्क दिया जाता है कि उसका यश फैले हुए दक्षिण भारत में कम से कम एक शताब्दी तो हो चुकी होगी और श्री शंकराचार्य, जो उस संत का सदर्भ देते है, स्वय तो अवश्य ही वी शताब्दी में हुए होगे। इस तर्क में अनेक न्यूनताएं देखी जा सकती है। सर्वप्रथम तो यह धारणा ही निराधार प्रतीत होती है कि किसी व्यक्ति की कीर्ति संपूर्ण देश में फैलने के लिए एक शताब्दी से न तो अधिक और न ही कम समय की आवश्यकता होती है। दूसरी बात यह है कि 'सौन्दर्य लहरो' आदि शंकराचार्य जी की रचना है, यही धारणा अत्यन्त सदिग्ध है। कुछ भी हो, पूरी की पूरी तो यह किसी भी प्रकार उनकी रचना नही है। ऐसा संभव है कि यह किसी अन्य परवर्ती शंकराचार्य को कृति हो। 


(३) यह बलपूर्वक कहा जाता है कि शकराचाय जी के सभी वर्णनों में पूर्व मीमासा" नामक दार्शनिक लघु-प्रथ के रचयिता श्री कुमारिल भट्ट को मिलने का सदर्भ आता है । अत चूंकि कुमारिल भट्ट "सन् ७०० ई० से पूर्व" नहीं हुए, उनसे आयु में पर्याप्त रूप से छोटे होने के कारण शकराचार्य जी ८वीं शताब्दी मे ही हुए होगे । इस मत को अस्वीकार करते हुए यह कहना आवश्यक है कि दीक है. वे दोनों व्यक्ति समकालीन थे, किन्तु कुमारिल भट्ट ही आज तक माने गये काल मे सैकडो वर्ष पूर्व की विभूति प्रतीत होते है। अत., यह विश्वास करने के स्थान पर कि कुमारिल भट्ट और शंकराचार्य ८वी शताब्दी (ईसवी पश्चात्) में हुए, अधिक सही यह प्रतीत होता है कि ये दोनो ही महानुभाव ईसवी पूर्व छठी शताब्दी में विद्यमान थे। 


(४) पश्चिमी विद्धानो की साग्रह धारणा रही है कि भारतीय सभ्यता बहुत अधिक प्राचीन नहीं है। उन लोगों ने अपनी इस पूर्वकल्पित धारणा के सामजस्य में सभी भारतीय तिथिक्रमो को तोडा-मरोड़ा है। इसलिये उन लोगो द्वारा पुराणो का काल-निर्धारण स्वयं ही प्रश्नास्पद है। 

(५) शातरक्षित की 'तत्व समग्रह' पर कमलशील की टीका में एक उद्धरण भी 'सूत्र-भाष्य' मे समाविष्ट कहा जाता है। यहाँ निवेदन है कि सभव है स्वय कमलशील ने ही शकराचार्य के सूत्र भाष्य' से यह उद्धरण ले लिया हो, हम लोग अभी तक उल्टा ही समझते रहे हों। 


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(६) कहा जाता है कि श्री शकराचार्य जी बौद्ध विद्वानो असग, दिन्नाग, नागार्जुन तथा अश्वघोष के मतो का खंडन किया है। विचार किया जाता है कि ये चारो विद्वान् ईसा पश्चात् तीसरी शताब्दी से पूर्व जीवित न थे अत शकराचाय ईसा पश्चात ८वी शताब्दी में हा रहे होगे। इस मत के खन्न मे कहना पडगा कि यद्यपि शकराचाय जी ने निस्सदेह रूप में बौद्ध-मीमांसा के सौतन्त्र विज्ञानवाद तथा शून्यवाद की विचारधारानो का खण्डन किया है, तथापि उन्होने असग, दिन्नाग अथवा नागार्जुन का कहीं भी नामोल्लेख नहीं किया है। वे बौद्ध-सिद्धान्त तो उन बौद्ध-विद्वानो के जीवन काल में प्रचा रित होने से बहुकाल पूर्व ही जनता मे प्रचलित हो चुके थे। अत: शंकराचार्य द्वारा अस्वीकृत सिद्धान्त तो असग, दिन्नाग अथवा नागार्जुन से बहुत समय पूर्व के है। साथ ही, यह भी संभव है कि ये तीनो महान भाव भी ईशा पश्चात् तीसरी शताब्दी से पूर्व ही हुए हो।। 

(७) कहा जाता है कि श्री शकराचार्य जी सुप्रसिद्ध सस्कृत कवि भर्तृहरि के पश्चात् हुए थे। भर्तृहरि का समय ईसा पश्चात् ६०० ६५० ऑका जाता है, अत अनुमान किया जाता है कि शंकराचार्य जी ८वी शताब्दी में थे। इसमे संदेह नहीं कि भर्तृहरि शकराचार्य जी से पूर्व विद्यमान थे, किन्तु यह दावा कि भत हरि ७वी शताब्दी ईसा पश्चात् जीवित थे, स्वय ही प्रश्नास्पद है। 


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