bhagwan mahaveer भगवान महावीर वर्तमान मानव जीवन में महावीर स्वामी की विचारधारा प्रकाशस्तंभ का काम करती है। जैन धर्म के आद्य संस्थापक श्री ऋषभदेव आदिनाथ थे।
bhagwan mahaveer कौन थे भगवान महावीर जानिए जन्म अनमोल विचार प्रसिद्धि और भारतीय मानव समाज में योगदानचौबीसवें अंतिम तीर्थंकर महावीर स्वामी संक्षिप्त परिचय,
ऋषभदेव से पार्श्वनाथ तक 23 तीर्थंकर हुए। चौबीसवें और अंतिम तीर्थंकर महावीर स्वामी थे जिन्हें वर्तमान जैन धर्म का संस्थापक माना जा सकता है। तीर्थंकर सामान्य सांसारिक जीवन से संपूर्णतः विकसित और अन्य जीवों को मोक्ष का मार्ग दिखाने की प्रवृत्ति वाले को कहते हैं। महावीर के 26 पूर्वजों का वर्णन जैन शास्त्रों में किया गया महावीर का जन्मईपू 599 चैत्र सुद त्रयोदशी को जन्म स्थानः वैशाली के निकट कुंडग्राम। पिताक्षत्रिय महाराजा सिद्धार्थ। माता त्रिशलादेवी। बचपन का नाम वर्धमान रखा गया था क्योंकि पुत्र के जन्म से पिता की समृद्धि बढ़ी थी। तपस्या काल में सभी प्रकार के भय संघर्ष और यातनाओं पर विजय प्राप्त की इसलिए वे वर्धमान महावीर कहे गए।
bhagwan mahaveer महावीर स्वामी का जीवन परिचय इन हिंदी,
महावीर में वैराग्य भाव पहले से ही था। शरीर से सुंदर और हृष्टपुष्ट और तेजस्वी थे। जन्म से ही ज्ञानी थे। विवाह करने की इच्छा न होते हुए भी मातापिता की भावनाओं का सम्मान करते हुए यशोदा के साथ विवाह किया। यशोदा से उन्हें प्रियदर्शना नाम की पुत्री हुई। महावीर 28 वर्ष के हुए तो उनके मातापिता दोनों की मृत्यु हो गई। बड़े भाई नंदवर्धन ने दो वर्ष के बाद संसार का त्याग करने के लिए कहा और महावीर ने 30 वर्ष की आयु में संसार को क्षणभंगुर समझ कर अंतिम सत्य की खोज के लिए कैवल्य की प्राप्ति के लिए संसार का त्याग किया। साढ़े बारह साल के साधनाकाल में महावीर की अपूर्व सहनशक्ति विरल समभाववृत्ति अद्वितीय क्षमावृत्ति और अद्भुत धैर्य का दर्शन होता है। आयु के 42वें वर्ष में समस्त कर्मकलंक का नाश करके वैशाख सुद 10मी के दिन पावापुरी में कैवल्य प्राप्त किया और अहँत जीवनमुक्त तीर्थंकर बने।
bhagwan mahaveer महावीर स्वामी की शिक्षा,
कैवल्यप्राप्ति के बाद महावीर ने तीस वर्ष तक जगहजगह पदयात्रा करके लोगों को अर्धमागधी भाषा में सन्मार्ग का उपदेश दिया।वे उनकी सभाओं में छूतअछूत ऊँचनीच सभी को श्रवण सुनने का अधिकार था। स्त्रियों को दीक्षा का अधिकारी माना पापियों का उद्धार किया मानव की प्रतिष्ठा करके जैनसंघ शासन की स्थापना की। ई 527 में दीपावली के दिन महावीर ने 72 वर्ष की आयु में इहलीला समाप्त करके सिद्ध बुद्ध मुक्त हुए। महावीर तपस्वी कर्मवीर थे।
bhagwan mahaveer जैन धर्म के 5 पांच नियम
समग्र जीवसृष्टि के प्रति करुणाभाव सम्यकत्व और सर्वांगी दृष्टि थी। कुशल आयोजक थे। राज्याश्रय के बिना अपने जीवनकाल में जैन धर्म का व्यापक और तीव्र प्रचार किया।
Bhagwan Mahaveer वे निम्न 5 पांच नियमों का पालन करते थे।
1 जहां दूसरों को अप्रीति हो वहां नहीं रहना चाहिए।
2 शरीर को प्रकृति के अधीन करना।
3 सामान्यतः मौन रहना।
4 हाथ में रखकर भोजन करना।
5 अपनी जरूरतों के लिए गृहस्थों पर निर्भर न करना। महावीर स्वामी सभी लोगों के लिए सुलभ थे और जिज्ञासुओं का संशय दूर करते थे।
bhagwan mahaveer महावीर स्वामी का उपदेश शिक्षा,
महावीर स्वामी का उपदेश महावीर निग्रंथ थे शास्त्रों की रचना नहीं की। वे संवाद करते थे और पट्टशिष्य गणधर उसे लिपिबद्ध कर लेते थे। उनके उपदेश 12 अंगों आचारांग सूत्रकृतांग आदि में संग्रहित हैं। अंगों में उल्लिखित उपदेशों की पुष्टि के लिए अन्य आचार्यों ने अंगबाहय ग्रंथ रचे। अंग और अंगबाहय ग्रंथों को मिलाकर आगम ग्रंथ जैन धर्म के प्राचीन प्रमाणभूत धर्मग्रंथ कहे जाते हैं। इन ग्रंथों में अन्य तीर्थंकरों और महावीर के विषय में जानकारी मिलती है। जिन का अर्थ है विजेता। राग द्वेष पर विजय प्राप्त करने के लिए जो वीतराग हुआ हो उसे जिन कहते हैं। जिन के अनुयायी जैन कहे जाते हैं।
bhagwan mahaveer अहिंसा जैन धर्म का प्राण,
श्रमण का अर्थ है संन्यासी। गृहस्थाश्रम में रहते धर्मकार्य करने वाले श्रावक कहे जाते हैं। धर्म जीवन में उत्कृष्ट मंगल है। अहिंसा संयम और तप धर्म हैं दशवैकालिका सूत्र। जैन धर्म मुख्यतः आचारधर्म है। अहिंसा जैन धर्म का प्राण है। सांसारिक सुख क्षणजीवी है जिनका परिणाम दुःख है। आत्मसुख चिरंजीवी है। समत्व दृष्टि और जीवदया हो तो अहिंसा का जन्म होता है। क्षमा नम्रता सरलता पवित्रता संयम संतोष तप सत्य ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह इन दस धर्मो का हर व्यक्ति को आचरण करना चाहिए।
bhagwan mahaveer जैन दर्शन रत्नत्रयी पर आधारित है।
1 सम्यक यथार्थ दर्शन
2 सम्यक् ज्ञान
3 सम्यक् चरित्र सदाचार ये तीनों मोक्ष के मार्ग हैं।
bhagwan mahaveer स्यादवाद,
कर्मवाद मनुष्य अपने विचार वाणी और क्रिया के लिए स्वंय उत्तरदायी है। स्यादवाद हर एक के पास से सत्यांश ग्रहण करना और पूर्ण सत्य का अनुसंधान करना। हो भी सकता है और नहीं भी हो सकता वाणी द्वारा वर्णन न किया जा सके ऐसा भी हो सकता है ये तीनों स्थितियां स्यादवाद के मूल में होती हैं। अनेकांत प्रत्येक व्यक्ति और वस्तु में विविध प्रकार के धर्म अंतर्निहित होते हैं। आत्मा के चार कषाय क्रोध को शांति से मान को मृदुता से माया को सरलता से और लोभ को क्रोध, मान, माया और लोभ ऐसे विकार है जो हमारी आत्मा को विकलांग बना रहे हैं।ये चारों कषाय किस प्रकार हमारे जीवन को विकलांग बना रही है। क्रोधी व्यक्ति अंधा होता है, उसे कुछ सूझता नहीं।
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