Maharishi Manu कौन थे स्मृतिकार मनु, मनु का सिद्धांत, सामाजिक उपदेश, वर्ण व्यवस्था और भारतीय समाज में योगदान।
Maharishi Manu manusmriti,
आर्य महा प्रजाओं के युगांतव्यापी जीवन की स्थिर आधार शिला स्थापित करने वाले अनेक महापुरुषों में मनु का नाम अप्रतिम तेज से प्रकाशित है। हमारे सहस्रमुखी जीवनक्रम का नियंत्रण करने का श्रेय मनु को प्राप्त होता है।
मनुस्मृति का व्यापक प्रभाव। Maharishi Manu ka prbhav desh videsh har jagah tha.
इंडो चाइना, वियतनाम, कम्बोडिया, जावा, सुमात्रा, बाली, मलेशिया, यूनान, बेबीलोन, असीरिया, थाइलैंड, सुमेरिया, बर्मा आदि देशों की जीवन प्रणाली और सांस्कृतिक जीवन पर मनु का स्पष्ट प्रभाव देखने को मिलता है। इंडोनेशिया के (Kulra Manav) के ग्रंथों, मेनीज-मिनोस-मोमीज (Law Givers), नेपोलियन कोड, रोमन लॉ, आदि में मनु के कई सिद्धान्तों को स्वीकार किया गया है।
Maharishi Manu मनुस्मृति में वर्ण व्यवस्था की प्रशंशा।
हेगल, थॉरो, एमर्सन, ह्वीटमैन ने मनुस्मृति का अध्ययन किया था। प्लेटो के आदर्श समाज की रचना मनु की चतुर्वर्ण प्रथा के अनुरूप थी। प्रसिद्ध जर्मन दार्शनिक नीत्से का कहना है।
Maharishi Manu manusmriti मैं सामाजिक न्यायिक व्यवस्था।
मनु का एक वचन है : स्त्री का कौमार्यावस्था में पिता द्वारा यौवनावस्था में पति द्वारा और प्राचीन आर्यजाति में स्त्री को रोज की लोकयात्रा में निश्चित बनाने की सर्वसंमत वैधानिक व्यवस्था थी। बाल्यावस्था में अनाचार से युवावस्था में दैहिक शोषण से रक्षा करने के लिए और वृद्धावस्था में कोई फुसला कर धन का हरण कर ले, इसके लिए यह व्यवस्था थी।
Maharishi Manu manusmriti मैं स्त्री की महता।
प्राचीन रोमन लॉ' (यूनानी कानून) में भी इस प्रकार की व्यवस्था है। प्राचीन ग्रीस, रोम,आरंभ काल में, ईसाई धर्म में, मध्यकालीन यूरोप के चर्च के कानून में, 19वीं सदी के आरम्भ में भी यूरोप की स्त्रियों की जो स्थिति थी उसकी तुलना में यहां (भारत में) उनकी स्थिति बहुत अच्छी थी, मनु तो यह भी कहते हैं, "जहां नारी की पूजा होती है, वहां देवता रमण करते है। अनेक स्थलों पर मनु ने स्त्री की महत्ता को स्वीकार किया है।
Maharishi Manu manusmriti मैं धर्म की परिभाषा।
मनु ने 10 मानवधर्म बताए हैं (6/92) :- धृति, क्षमा, अस्तेयु, शोच, इन्द्रियनिग्रह, बुद्धि, विद्या, सत्य, अक्रोध। राजा का निरंकुशवाद नियंत्रित था। उन्होंने धर्म नियंत्रित काम और अर्थ को पुरुषार्थ माना। क्लेश बिना धन संचय करने के लिए मनु ने कहा है। महायन्म प्रवर्तनम (11/63)-महायंत्र का विस्तार नहीं करना चाहिए। मनु मानते हैं कि वर्ण और आश्रम की व्यवस्था पर निर्मित समाज सर्वांगीण विकास प्राप्त कर सकता है। समाज में विवाद कम हों और व्यक्ति का विकास हो ऐसे सहकारी समाज की स्थापना होनी चाहिए। जो सभी जीवों में स्थित परमात्मा को आत्मस्वरूप देखता है, वह समबुद्धि प्राप्त करके ब्रह्मरूप मोक्ष को प्राप्त करता है, ऐसा मनु का मानना है। मनु ने मानव वंश के लिए युगलपक्षी संस्कृति प्रदान की है। भारतीय संस्कृति के इस प्रणेता ने मानव समाज के हित के लिए परम कल्याणकारी योजना गढ़ी है।
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