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Gautam Buddha धर्मप्रवर्तक गौतम बुद्ध का जन्म और ज्ञान की प्राप्ति कब हुआ था

Gautam Buddha धर्मप्रवर्तक गौतम बुद्ध का जन्म और ज्ञान की प्राप्ति कब हुआ था।



भगवान गौतम बुद्ध बौद्धिक प्रमाणिकता, नैतिक उत्कटता और आध्यात्मिक अंतदृष्टि की कसौटी पर बुद्ध निःसंदेह एक महान धर्मप्रवर्तक के रूप में इतिहास में अमर हैं। 


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Gautam Buddha aur bharat.


बुद्ध के जन्म के समय देश में जड़ कर्मकांड, अंधविश्वास, मंत्र-यंत्र-तंत्र में आस्था, स्वर्गप्राप्ति के लिए होने वाले यज्ञों में पशुओं की बलि, जन्म पर आधारित वर्णों की मान्यता, छुद्रों जैसी स्त्रियों की दशा, विलासी राजा, इन सभी के बीच प्रजा पिस रही थी। लोगों को दुःखों से मुक्ति का मार्ग बताने के लिए बुद्ध का आविर्भाव हुआ। पूरी दुनिया जिन्‍हें भगवान बुद्ध या महात्‍मा बुद्ध के नाम से जानती और मानती है। वास्‍तव में उनका नाम सिद्धार्थ गौतम था। बचपन में इस नाम से पुकारे जाने वाले सिद्धार्थ बाद में वो भगवान बुद्ध कहलाए और उन्‍होंने ही बौद्ध धर्म की तमाम प्रथाओं, परंपराओं और इसके मुताबिक आदर्श जीवन को परिभाषित किया। हर साल बैशाख माह की पूर्णिमा को भगवान गौतम बुद्ध का जन्‍मोत्‍सव मनाया जाता है। बौद्ध धर्म के अनुयायी बुद्ध पूर्णिमा के इस दिन को बड़े ही उत्‍साह के साथ पारंपरिक ढंग से मनाते हैं। महात्‍मा बुद्ध ने अपने जीवन में तमाम ऐसे उपदेश दिए,


Mahatma Buddha ka Janam Mata aur Pita.


ई. पू. 623 में शाक्य वंश के राजा शुद्धोदन की रानी महामाया की कोख से कपिलवस्तु के समीप लुम्बिनी वन में एक शाल वृक्ष के नीचे एक बालक ने जन्म लिया। पुत्र-प्राप्ति की माता-पिता की इच्छा पूरी हुई, इसलिए उन्होनें पुत्र का नाम सिद्धार्थ रखा। गौतम उनका गौत्र था। पुत्र जन्म के सातवें दिन ही महामाया का अवसान हो गया। विमाता गौतमी ने सगे पुत्र की तरह उनका लालन-पालन किया। सिद्धार्थ बचपन से ही अंर्तमुख हो जाते थे, मन मे जीवमात्र के लिए करूणा थी, सुखोपभोत्र के लिए अनिच्छा स्वभाव संयत था। असित ऋषि ने भविष्यवाणी की थी कि "यह बालक जगत का उद्धारक होगा"। साधु होने से पुत्र को रोकने के लिए पिता ने उसके भोग विलास के लिए अलग-अलग महल बनवाए। यशोधरा जैसी सर्वगुण संपन्न कन्या से उसका विवाह हुआ। राहुल नामक पुत्र हुआ। 


Gautam Buddha Ka Vairagy aur Grih Tyag. Hindu Dharam Ke 9 ve Avtaar,



एक दिन सिद्धार्थ रथ में बैठकर बाहर गए और वृद्ध, रोगी, मृतव्यक्ति और संन्यासी को देखा। मन में विराग उत्पन्न हुआ और पुत्र जन्म के सातवें दिन 29 वर्ष की आयु में सत्य और सांसारिक दुःखों के निवारण के उपायों की खोज में महामिनिष्क्रमण किया। राजग्रह में सम्राट बिंबसार को उपदेश देकर यज्ञ के लिए होने वाले पशु-वध को बंद करवाया। आलार कलाम के पास ध्यान पद्धति और उद्यक राम के पास समाधि की अंतिम सीढ़ी तक का ज्ञान प्राप्त किया। छः वर्ष तक कठोर तपस्या की परंतु मन को संतोष नहीं हुआ। शरीर क्षीण हो गया था। मध्यमार्ग की अनिवार्यता समझ में आई। धनवान स्त्री सुजाता ने सेवा करके स्वस्थ किया। वैशाखी पूर्णिमा के दिन बुद्धत्व-प्राप्ति के दृढ़ संकल्प के साथ बोधि वृक्ष के नीचे बैठ गए। उन्हें चलायमान करने के लिए 'मार' (तृष्णा और चित्तगत दुर्वृत्तियों का प्रतीक) के प्रयत्न निष्फल गए। गौतम को परमज्ञान (संबोधि) हुआ। वे बौधिसत्व से बुद्ध हो गए। उनके जन्म और ज्ञान प्राप्ति के बीच के जीवन काल उदारवादी रहा। हिन्दू अवतारों मै ये श्री विष्णु के नौवे अवतार माने गए है। 



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