Maharishi ved vyash कौन थे महर्षि वेदव्यास जानिए जन्म अनमोल विचार और प्रसिद्धि और भारतीय मानव समाज में योगदान.
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Maharishi ved vyash.
भारतीय साहित्य के आदि कवि, गुरु आदि संपादक एवं अद्वितीय साहित्यकार जिन्होंने दुनिया के प्राचीनतम और अमर साहित्य वेदों का उपहार इस मानव समाज को दिया, महर्षि वेद व्यास के नाम से विख्यात कृष्ण द्वैपायन को उनकी जन्मतिथि आषाढ़ पूर्णिमा, गुरु पूर्णिमा या व्यास पूर्णिमा कहा गया है।
ved vyash कौन थे महर्षि वेद व्यास।
महर्षि व्यास पराशर मुनि के पुत्र थे। एक बार सत्यवती जब उन्हें अपनी नाव में बिठाकर नदी पार करा रही थी, तो सत्यवती के सौंदर्य से मुग्ध पराशर ने उससे उस नाव में ही सहवास कर लिया और सत्यवती गर्भवती हो गई। व्यास का जन्म उसी गर्भ से हुआ। विचित्र बात यह है कि स्वयं सत्यवती आद्रिका नाम की किसी अप्सरा की संतान मानी जाती हैं और सत्यवती-पुत्र व्यास भी आगे चलकर कभी घृताची नाम की अप्सरा से आकृष्ट हो गए थे और इस अप्सरा से उन्हें शुकदेव नामक परम ज्ञानी पुत्र की प्राप्ति हुई थी। इन व्यास का जन्म आज से करीब पाँच हजार वर्ष पूर्व किसी वैशाख पूर्णिमा के दिन हुआ था, पर उनके ठीक-ठीक जन्म वर्ष के विषय में विद्वानों में मतभेद कायम है। व्यास का रंग काला था, इसलिए इनका नाम कृष्ण था। पर उसी युग में कृष्ण के नाम से जब देवकीनंदन कृष्ण की एकरूपता स्थापित हो गई तो उनसे अलग दिखाने के लिए व्यास का नाम रख दिया गया—कृष्ण द्वैपायन, अर्थात् वे कृष्ण जो द्वीप में पैदा हुए थे।
Ved vyash: व्यास के बारे में एक मजेदार सूचना यह है कि इन्हें महात्मा बुद्ध के पूर्वजन्मों में से एक माना जाता है। बौद्ध परंपरा के अनुसार बौद्ध बनने से पहले सिद्धार्थ ने अनेक पूर्वजन्म बिताए थे। इन जन्मों में बुद्ध को बोधिसत्त्व कहा गया है। ऐसे अनेक बोधिसत्त्वों में से एक का नाम कण्ह द्वैपायन (कृष्ण द्वैपायन) कहा गया है। जो लोग बौद्धों को हिंदुओं से कुछ अलग साबित करने के लिए लट्ठ उठाए फिरते हैं, यह सूचना उन्हें कुछ निराश कर सकती है। व्यास ने अपने जीवनकाल में बदरी आश्रम में घोर तपस्या की थी। यह आश्रम हिमालय में सरस्वती और अलकनंदा के संगम पर था। शायद यह आश्रम उसी स्थान पर था जहाँ आज भारत का एक महान् तीर्थ बदरीनाथ है। यहाँ तप करने के कारण व्यास का नाम बादरायण मुनि पड़ गया।
ved vyash महर्षि वेद व्यास महान आदि कवि सिद्धांतवादी।
वेदव्यास के चार मुख नहीं फिर भी वे ब्रह्मदेव जैसे हैं; चार हाथ नहीं, फिर भी वे विष्णु जैसे हैं; तीसरी आंख नहीं, फिर भी वे शिवजी जैसे हैं। विष्णुरूपी व्यास को और व्यासरूपी विष्णु को मैं नमस्कार करता हूँ। जिन्होंने अपनी सरस्वती द्वारा समग्र भारतवर्ष को पवित्र किया है, ऐसे कवि, विधाता, सर्वज्ञ व्यास को हमारा प्रणाम है।
ved vyash भगवान कृष्ण के वचन।
श्रीकृष्ण गीता में कहते हैं, मुनियों में मैं व्यास हूँ (10/31)। व्यास भारत की निधि हैं, भारतीय संस्कृति के प्राण, आर्यधर्म के प्रतिष्ठापक और व्याख्याता हैं। व्यासजी दैविक शक्ति-संपन्न, महान योगी, अगाध विद्वान, महाकवि, महादार्शनिक, महान उपदेशक, तत्वद्रष्टा और कृष्ण भक्ति के महान गायक और प्रचारक थे। व्यासजी विष्णु के अंशावतार स्वयं भगवद्स्वरूप थे। वशिष्ठ के पुत्र शक्ति और शक्ति के पुत्र पराशर थे। पराशर ऋषि और मत्स्यगंधा नामक निषाद कन्या के समागम से व्यास का जन्म हुआ था।
ved vyash कृष्णद्वैपायन व्यास।
भारतीय मतानुसार महर्षि व्यास एक ऐतिहासिक महापुरुष थे। 'व्यास' शब्द का अर्थ है- व्यवस्था करने वाला, स्थापित करने वाला, अथवा विस्तार करने वाला। व्यास के अन्य नाम- कृष्ण, सत्यवतीसुत, माधव, सत्यभारत, सत्यव्रत, कानीव, वासुदेव आदि हैं। व्यास एक व्यक्ति विशेष नहीं, वरन् एक पदवी है। वैवस्वत मन्वंतर में कृष्णद्वैपायन अट्ठाईसवें व्यास हैं। उनके पूर्व हुए व्यासों के नाम पुराणों में दिए हैं। व्यास के शरीर का रंग श्याम था, इसलिए कृष्ण और द्वीप में जन्मे थे, इसलिए द्वैपायन, इस प्रकार कृष्ण द्वैपायन के नाम से वे प्रसिद्ध हुए। पहले एक ही वेद था। वेद के मंत्र, ऋचाएं अलग-अलग ऋषियों के पास बिखरी पड़ीं थीं। उन सबको एकत्र कर उनका संकलन करके वेद का चार संहिताओं (ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद) में विभाजन किया और वर्तमान स्वरूप दिया इसलिए वे वेद व्यास के रूप में विख्यात हुए। बदरीवन में रहकर उग्र तपस्या करने के कारण 'बादरायण' और पराशर ऋषि के पुत्र होने के कारण वे 'पाराशर्य' के नाम से भी जाने जाते हैं।
ved vyash महान उपदेशक और लोकनायक।
व्यास के व्यक्तित्व के विविध पक्ष:- महाकवि व्यास- महाभारत, पुराण आज भी पथप्रदर्शक और श्रद्धास्पद माने जाते हैं। भक्ति कवि व्यास- श्रीकृष्ण भक्ति के महा गायक और प्रचारक। महान दार्शनिक व्यास- ब्रह्मसूत्र, भागवत का ग्यारहवां स्कंध, गीता, अध्याय रामायण। महाभारत में व्यासजी के दार्शनिक विचार हैं। महान उपदेशक और लोकनायक व्यास- परोपकार की पुण्य और पर-पीड़ा पाप है, ऐसे अनेक सत्य उपदेश जनता जनार्दन की भलाई के लिए दिया। विश्वप्रेम की प्रतिष्ठा और महामानव स्वरूप की स्थापना की, एकात्मभाव स्थापित किया। व्यास जी की विद्वता 'न भूतो न भविष्यति' इस कथन का उपमा-रहित उदाहरण है।
ved vyash महर्षि वेद व्यास का भारतीय संस्कृति में योगदान।
व्यासजी ऋषिप्रणीत शास्त्रों, वेद, वेदांग, संगीत, ज्योतिष, व्याकरण, भौतिक विज्ञान, धर्मशास्त्र, राजनीति शास्त्र, अर्थ शास्त्र, आयुर्वेद, ललित कलाएं, संपेक्ष में शास्त्रों और कलाओं के ज्ञाता थे। व्यास साहित्य, वेद का संकलन, विभाग किए। ब्रह्मसूत्रों (वेदांतदर्शन) की रचना। महाभारत-पांचवां वेद माना जाता है। महाभारत के विषय में कहा जाता है कि, जो यहां है वही अन्यत्र भी है और जो यहां नहीं हैं वह अन्यत्र कहीं भी नहीं है।
ved vyash विश्वकोश श्रेष्ठ धर्मशास्त्र
भारतीय संस्कृति का यह विश्वकोश, श्रेष्ठ धर्मशास्त्र और उत्कृष्ट मोक्षशास्त्र भी है। पुराण उपपुराण भारतीय संस्कृति के आधार-स्तंभ हैं। अध्यात्म रामायण- अध्यात्मविद्या का ग्रंथ। त्रिभुवन में जो कुछ देखने, सुनने, समझने को मिलता है वह सब व्यास जी के हृदय में था, इसलिए कहा गया है कि 'व्यासोच्छिष्टम् जगत सर्वम्'। विश्व संस्कृति ने अभी तक व्यास के समकक्ष का महापुरुष उत्पन्न नहीं किया है।
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