Manu Aur Shatrupa: मनु शतरूपा की वंशावली इतिहास - मनु और शतरूपा की कहानी - राजा मनु की कहानी
Manu Aur Shatrupa:
मनु-शतरूपा की वंशावली इतिहास
मनु और शतरूपा की कहानी
राजा मनु की कहानी,
वैशम्पायन जी ने पुराण इतिहासिक घटनाएं को बताते हुए आगे बताते है की, हे जनमेजय इस प्रकार अयोनिज मानसिक प्रजाओ की रचना हो जाने पर आपव प्रजापति ब्रह्मा ही अपनी देह के दो भाग कर के एक भाग से मनु नामक पुरुष बन गये और उन्होंने देह के दूसरे भाग से बनी हुई अयोनिजा शतरूपा को पत्नी रूप में स्वीकार किया,
Manu Aur Shatrupa मनु का धर्म,
महाराज अपनी महिमा से धुलोक को व्याप्त करके स्थित हुए मनु के धर्म से ही उनकी पत्नी शतरूपा की उत्पत्ति हुई, वह शतरूपा दस हजार वर्षों तक परम दुष्कर तप करके संतान की कामना से तप से चमकते हुए अपने स्वामी वैराज पुरुष के पास आयीं, वे पुरुष ही स्वायम्भुव मनु कहे जाते हैं, उन के अधिकार का सत्ययुग त्रेता द्वापर और कलियुग रूप इकहत्तर 71 चतुर्युगो का समय इस संसार में मन्वन्तर कहलाता है यह मन्वन्तर संध्या और संध्यांश के कारण इकहत्तर चतुर्युगो से भी कुछ अधिक समय का होता है, वैराज
Manu Aur Shatrupa मनु-शतरूपा की वंशावली इतिहास,
वीर नामक पुत्र को जन्म दिया और वीर से उनकी पत्नी काम्या ने, प्रियव्रत तथा उत्तानपाद को उत्पन्न किया, कर्दम प्रजापति की एक काम्या नामवाली पुत्री थी उस काम्या के सम्राट् कुक्षि विराट और प्रभु नामक चार पुत्र उत्पन्न हुए, उस काम्या ने प्रियव्रत को पति रूप मे पाकर इन पुत्रो को उत्पन्न किया था,
Manu Aur Shatrupa मनु-शतरूपा की वंशावली,
प्रजापति अत्रि ने उत्तानपाद को पुत्र रूप में ग्रहण कर लिया, उत्तानपाद से उनकी पत्नी सूनृता ने चार पुत्रो को उत्पन्न किया, धर्म की एक सूनृता नाम से प्रसिद्ध सुन्दर कटि वाली पुत्री थी वह धर्म के यहाँ अश्वमेध यज्ञ से प्रकट हुई थी यही कल्याण कारिणी सूनृता ध्रुव की माता थी, प्रजापति उत्तानपाद ने सूनृता नाम वाली पत्नी से ध्रुव कीर्तिमान् शान्त स्वरूप शिव और अयस्पति नामक पुत्र को उत्पन्न किया था,
Manu Aur Shatrupa मनु शतरूपा विष्णु पुराण,
महाराज ध्रुव ने जिनका नाम महायश है उन भगवान् नारायण को पाने की इच्छा से तीन हजार दिव्या वर्ष तक तप किया था, प्रजापालक भगवान् ब्रह्मा विष्णु ने ध्रुव पर प्रसन्न होकर उनको सप्तर्षियो के सम्मुख एक अलौकिक अचल स्थान प्रदान किया, ध्रुवकी बड़ी भारी समृद्धि और महिमा को देखकर देवता और असुरो के आचार्य शुक्राचार्य ने इस श्लोक का गान किया, इन ध्रुव के तपोबल को देख कर आश्चर्य होता है इनका शास्त्र ज्ञान भी विस्मय विमुग्ध कर देता है और इनकी शक्ति भी अद्भुत है तभी तो ये सप्तर्षि भी इनको अपने आगे स्थापित करके स्थित हैं, उन
Manu Aur Shatrupa Dhruv Saptatara, ध्रुव,
ध्रुव से शम्भु नाम वाली स्त्री ने श्लिष्टि और भव्य नामक पुत्रो को उत्पन्न किया, श्लिष्टि से सुच्छाया नाम की पत्नी ने रिपु रिपुञ्जय पुण्य वृकल और वृकतेजा पाँच निष्पाप पुत्रो को उत्पन्न किया, रिपु से उनकी बृहती नाम की पत्नी ने सब देवताओ के तेज से परिपूर्ण चाक्षुष नामक पुत्र को उत्पन्न किया, चाक्षुष ने वीरण की पुत्री पुष्करिणी के गर्भ से मनु नामक पुत्र को उत्पन्न किया,
Manu Aur Shatrupa, वैराज प्रजापति के वंश,
ऊरु पुरु शतद्युम्न तपस्वी सत्यवान् कवि अनिष्टुत् अतिरात्र और सुधुम्र, ये नौ और दसवाँ अभिमन्यु ये नड्वला के पुत्र कहे जाते हैं, ऊरु से अग्नि की कन्या ने अङ्सुमना ख्याति क्रतु अङ्गिरा और गय नामक उत्तम कान्ति वाले छः पुत्रो को उत्पन्न किया था, अङ्गसे मृत्यु की पुत्री सुनीथा ने वेन नामक एक पुत्र को उत्पन्न किया था,
Manu Aur Shatrupa, पृथु की उत्पत्ति,
वेन अत्याचारी था देवता धर्म आदि से द्रोह रखता था अत एव ऋषियो को उसपर बड़ा क्रोध आया, ऋषियो के कोप से नष्ट हुए वेन के दाहिने हाथ को मुनियो ने संतान उत्पन्न करने के लिये मथा तब मुनियो के मथे हुए वेन के दाहिने हाथ से पृथु की उत्पत्ति हुई,
Manu Aur Shatrupa, राजाओ की वंशावली,
ऋषियो ने उसको देख कर कहा, यह पृथु प्रजाओ को प्रसन्न करेगा और इस महातेजस्वी को उत्तम यश की प्राप्ति होगी, तब वे क्षत्रिय जाति में प्रथम उत्पन्न हुए वेन के पुत्र पृथु धनुष कवच और तलवार धारण कर अपने तेज से डाकू अधर्मी आदि दुष्ट पुरुषो को भस्म करते हुए इस पृथ्वी की रक्षा करने लगे, पृथु राजसूय यज्ञ में अभिषिक्त होने वाले राजाओं में प्रथम भूपति हैं, उन्हींके यज्ञ में अग्नि से राजाओ की स्तुति करने में चतुर सूत तथा राजाओ की वंशावली पढ़ने में प्रवीण मागध प्रकट हुए थे,
Manu Aur Shatrupa, भरतवंशी महाराज.
भरतवंशी महाराज प्रजाओ को आजीविका देने की इच्छा वाले पृथु ने देवता और ऋषियो की मण्डलियो को साथbमें ले गौरूपिणी पृथ्वी से अन्न आदि सकल वस्तुओ को दुहा था, पृथुके समय पितर दानव गन्धर्व अप्सरा सर्प यक्ष वृक्ष और पर्वतो ने अपने अपने पात्रो में दुहा था, पृथ्वी ने उनको इच्छानुसार दूध दिया था और उस दूध से उन सब ने अपने प्राणो को धारण किया था, पृथु के अन्तर्धान और पालित ये दो धर्मज्ञ पुत्र हुए और अन्तर्धान से शिखण्डिनी ने हविर्धान नामक पुत्र को उत्पन्न किया, हविर्धान से अग्नि की पुत्री धिषणा ने प्राचीन बर्हि शुक्ल गय कृष्ण व्रज और अजिन नाम वाले छ पुत्रो को उत्पन्न किया,
Manu Aur Shatrupa, मनु के पुत्र का नाम,
महराज बर्हि जिन्हो ने प्रजाओ का पालन एवं संवर्धन किया था अपने पिता हविर्धान से बढ़ कर प्रजा पालक हुए, जनमेजय उनके यज्ञ करते समय बिछे हुए प्राचीनाग्र कुश समस्त भूमण्डल पर फैल कर उनके महत्त्व को प्रकट कर रहे थे अत एव उनका नाम भगवान् प्राचीन बर्हि है, महीपति प्रभु प्राचीन बर्हि ने बड़ा भारी तप करने के पश्चात् समुद्र की पुत्री सवर्णा के साथ विवाह किया, प्राचीनबर्हि से समुद्र की पुत्री सवर्णा ने दस पुत्र उत्पन्न किये उन दसो का प्रचेता यह एक ही नाम था,
Manu Aur Shatrupa, स्वयंभू मनु की वंशावली,
वे सब धनुर्वेद के पार गामी थे, सब प्रचेता गण एक साथ समान धर्म कर्म का आचरण करते थे और एक से शील वाले थे उन्होने समुद्र के जल में प्रवेश कर के दस हजार वर्ष तक बड़ी भारी तपस्या की, जब प्रचेता गण तप कर रहे थे तब अरक्षित पड़ी हुई पृथ्वी को वृक्षो ने चारो ओर से ढक दिया इस से प्रजाओ का नाश होने लगा, दस हजार वर्षों में वृक्षो ने आकाश तक को घेर लिया तब वायु का चलना बंद हो गया और प्रजाओ का चेष्टा करना हाथ पैर हिलाना भी बंद होने लगा अपनी तपस्या ज्ञान दृष्टि से इन सब बातो को जान कर सब प्रचेता इसका उपाय करने के लिये उद्यत हो गये और उन्हो ने क्रोध में भर कर अपने मुखो से वायु और अग्नि को प्रकट किया, वायु ने वृक्षो को जड़ से उखाड़ कर उनको सुखा दिया तब अग्नि प्रचण्ड होकर उन वृक्षो को जलाने लगी इस प्रकार वृक्षो का नाश होने लगा, इस प्रकार जलते जलते जब कुछ ही वृक्ष बाकी बचे तब वृक्षो के संहार की बात को जान कर इन
Manu Aur Shatrupa, मनु के अनुसार राज्य का कार्य क्षेत्र क्या है,
वृक्षो के राजा सोम प्रजापति प्रचेताओ के पास जाकर बोले, प्राचीनबर्हि के पुत्र प्रचेता ओ तुमने तो पृथ्वी को वृक्षोंl से शून्य ही कर डाला, राजाओ अब अपने क्रोध को रोको तथा इन अग्नि और पवन को शान्त करो, यह वृक्षो की रत्न स्वरूपा सुन्दरी कन्या है, मैंने भविष्य के तत्त्व को जान कर इसे अपने गर्भ में स्थापित कर लिया था, यह मारिषा नाम वाली कन्या वृक्षो के वीर्य अर्थात् सारांश से रची गयी है, महाभाग इस सोमवंश की वृद्धि करने वाली वृक्षो की कन्या को तुम भार्या रूप में ग्रहण करो, तुम्हारे और मेरे दोनो के तेज के आधेआ धे भाग के द्वारा इस कन्या के गर्भ से एक पुत्र उत्पन्न होगा जिसका नाम होगा, दक्ष प्रजापति, तुम्हारे तप रूपी अग्नि से अग्नि के समान ही प्रतापी वह दक्ष अधिकांश जली हुई इस पृथ्वी पर फिर प्रजाओ की वृद्धि करेगा, चन्द्रमा के इस प्रकार कहने पर उन प्रचेताओ ने वृक्षो की ओर से अपने क्रोध को समेट लिया और मारिषा को विवाह रूपी धर्म के द्वारा पत्नी रूप में ग्रहण कर लिया, तदनन्तर उन प्रचेताओं ने अपने मन से मारिषा में गर्भ स्थापित किया,
Manu Aur Shatrupa, प्रजापति दक्ष का जन्म और इतिहास,
भरतवंशी राजन् इस प्रकार चन्द्रमा के अंशसे दस प्रचेताओंके द्वारा मारिषा के गर्भ से महा तेजस्वी दक्ष प्रजा पति उत्पन्न हुए, तब उन दक्ष प्रजा पति ने चन्द्रमा के वंश को बढ़ाने वाले पुत्र उत्पन्न किये और स्थावर जङ्गम दो पैर वाले चार पैर वाले रचने योग्य प्राणियो की सृष्टि के लिये मन में विचार कर पीछे स्त्रियो की भी रचना की, दक्ष ने उनमें से दस कन्याएँ धर्म को तेरह कन्याएँ कश्यप को और शेष बची हुई नक्षत्र सम्बन्धी नाम वाली सत्ताईस कन्याएँ राजा चन्द्रमा को दे दी, उन कन्याओ से देवता पक्षी सर्प गौएँ दैत्य दानव गन्धर्व अप्सराएँ तथा अन्य जातियो के प्राणी उत्पन्न हुए,
Manu Aur Shatrupa, मैथुन सृष्टि.
तभी से प्रजाएँ मैथुन द्वारा उत्पन्न होने लगीं। इससे पहले प्राणियो की उत्पत्ति संकल्प दर्शन और स्पर्श से होती थी, ऐसा कहा जाता है,
जनमेजय ने कहा, मुने आपने पहले भी देवता दानव गन्धर्व सर्प और राक्षस तथा महात्मा दक्ष की उत्पत्ति का वर्णन किया है, निष्पाप महर्षे वहाँ आप ने कहा है कि ब्रह्मा जी के दाहिने अंगूठे से दक्ष प्रजापति उत्पन्न हुए और ब्रह्मा जी के बायें अंगूठे से दक्ष की पत्नी उत्पन्न हुए, महा तपस्वी दक्ष फिर प्रचेताओ के पुत्र कैसे हुए चन्द्रमा के नाती दक्ष फिर उन के श्वशुर कैसे बन गये विप्र वर मेरे इन संदेहो को भली प्रकार व्याख्या कर के आप दूर कर दीजिये,
Manu Aur Shatrupa, सृष्टि की उत्पत्ति,
वैशम्पायन जी ने कहा, पृथ्वी नाथ जन्म और मृत्यु ये समस्त प्राणियो के लिये नित्य स्वाभाविक हैं, इस विषय में ऋषियो को कभी मोह नहीं होता, जो विद्वान् पुरुष हैं वे भी इस विषय में मोहित नहीं होते, ये दक्ष आदि सब लोग प्रत्येक युग में उत्पन्न होते और मरते रहते हैं अतः विद्वान् पुरुष इस विषय में मोह को नहीं प्राप्त होते हैं, राजन् पहले इनमें ज्येष्ठता और कनिष्ठता का अर्थात् पहले पीछे उत्पन्न होने का कोई विचार नहीं था तप ही इनकी दृष्टि में गरिष्ठ था और प्रभाव ही इनमें सम्बन्ध होने का कारण होता था, जो मनुष्य चर तथा अचर प्राणियो सहित इस दक्ष प्रजापति की सृष्टि के तत्त्व को जानता है वह संतान वान् होता है और आपत्तियो के पार हो स्वर्ग लोक में प्रतिष्ठा पूर्वक रहता है,
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