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Srishti Utpatti पुराणों के अनुसार सृष्टि की उत्पत्ति कैसे हुई - सृष्टि रचना उत्पति का पौराणिक रहस्य

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Srishti Utpatti सूत जी से कहा,

शौनक जी ने व्यास शिष्य श्री सूत जी से कहा, सूत नन्दन आपने भरत वंशियों अन्य सब राजाओं देवताओं दानवों गन्धर्वो नागों राक्षसों दैत्यों सिद्धों तथा गुह्यकों से सम्बन्ध रखने वाला यह बहुत बड़ा उपाख्यान महाभारत कह सुनाया, आपने ऋषि महर्षियों के अद्भुत कर्म शूरवीरों के बल विक्रम धर्म तत्त्व के निर्णय विचित्र विचित्र कथा प्रसङ्ग तथा द्रोण आदि के श्रेष्ठ एवं परम उत्तम जन्म वृत्तान्त आदि प्राचीन एवं पुण्य प्रद विषयों का अपनी मधुर वाणी द्वारा वर्णन किया है, अब आप भरत वंश का इतिहास बताने की कृपा करो और सृष्टि उत्पत्ति कैसे हुई का रहस्य बताए 

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Srishti Utpatti प्रजापति से आरम्भ, 

सूत पुत्र उग्रश्रवा ने कहा शौनक जी जनमेजय ने व्यास जी के धर्मवेत्ता शिष्य वैशम्पायन जी से जो कुछ पूछा था उसी के अनुसार मैं आरम्भ से ही वृष्णियों के वंश का आप से वर्णन करता हूँ, भरतवंशी राजाओं के इतिहास को पूर्ण रूप से सुनकर भरत नन्दन महा बुद्धिमान् जनमेजय ने वैशम्पायन जी से कहा, जनमेजय ने कहा, मुने आपने पहले वेद के अर्थ को स्पष्ट करके विस्तृत रूप में वर्णन करने वाली धर्म अर्थ काम मोक्ष आदि अनेक अर्थों से भरी हुई जो महाभारत की कथा विस्तार पूर्वक कही उसको मैंने सुन लिया, उस महाभारत कथा में आपने बहुत से पुरुष श्रेष्ठ शूरों का वर्णन किया तथा बहुत से वृष्णि और अन्धकवंशी महारथियों के नाम और कर्म भी बताये, द्विजोत्तम उनके उत्तम कर्मों का भी आपने उन उन स्थलों में संक्षिप्त रूप से वर्णन किया है, प्रभो अब आप उनको विस्तार पूर्वक सुनाइये, आपने पहले जो संक्षिप्त रूप से वर्णन किया उससे मेरी तृप्ति नहीं हुई है, ये वृष्णि और पाण्डव एक ही राशि कुटुम्ब के माने जाते हैं, तपोधन आप वंशों की कथा कहने में चतुर हैं और उनकी सब बातों को आपने प्रत्यक्ष देखा है, अत एव उनके कुल का आप विस्तार पूर्वक वर्णन कीजिये, महामुने जिस जिस के कुल में जो जो उत्पन्न हुए हों उन सबको मैं जानना चाहता हूँ अत एव प्रजापति से आरम्भ कर के पूर्व काल में उनकी जिस प्रकार सृष्टि हुई है उन सबका विचार करके आप मुझे पूर्ण रूप से सब कथा सुनाइये,




Srishti Utpatti katha सृष्टि की रचना कब और कैसे हुई.


उग्रश्रवा ने कहा जब सत्कार पूर्वक उनसे यह बात पूछी गयी तब वे महा तपस्वी महात्मा वैशम्पायन क्रमशः और विस्तार के साथ उस वंशावलि का वर्णन करने लगे, वैशम्पायन जी ने कहा, राजन् सुनो यह वृष्णि वंशियों के जन्म की कथा अलौकिक पुण्यमयी और पापों से मुक्त करने वाली है इसमें धर्म अर्थ काम मोक्ष आदि अनेक पुरुषार्थों का उपदेश है इस वेद के समान माननीय तथा आश्चर्यमयी कथाका मैं आपसे वर्णन करता हूँ, जो इस कथाको अपने हृदयमें धारण करता है या इसको पुस्तक के रूप में अपने घर में स्थापित करता है अथवा बारबार इसको सुनता है वह इस लोक में अपने वंशको स्थापित कर अन्त में स्वर्गलोक में प्रतिष्ठित होता है, जो नित्य सद सत्स्वरूप तथा कारण भूत अव्यक्त प्रकृति है उसी को प्रधान कहते हैं,


Srishti Utpatti नित्य सनातन प्रधान उपादान कारण प्रकृति,


सर्वशक्तिमान् पुरुष ने उसी से इस विश्व का निर्माण किया है, महाराज तुम अमित तेजस्वी ब्रह्मा जी को ही पुरुष समझो, वे समस्त प्राणियों की सृष्टि करने वाले तथा भगवान् नारायण के आश्रित हैं, प्रकृति से महत्तत्त्व की उत्पत्ति महत्तत्त्व से अहंकार तथा अहंकार से सब सूक्ष्म भूत उत्पन्न हुए है, भूतों के जो स्थूल भेद हैं वे भी उन सूक्ष्म भूतों से ही प्रकट हुए हैं,यह अनादि काल से प्रवाह रूप से चला आने वाला सनातन सर्ग है, अब जैसी मेरी बुद्धि है और जैसा मैंने गुरुजनों से सुन रखा है उसके अनुसार मैं भूत सर्ग का विस्तार पूर्वक वर्णन आरम्भ करता हूँ सुनो, यह प्रसंग पूर्वजों की कीर्ति का विस्तार करने वाला है, स्थिर कीर्ति वाले उन समस्त पुण्यकर्मा पूर्वजों के यश का कीर्तन धन और यश की वृद्धि करने वाला शत्रुओं का नाशक स्वर्ग की प्राप्ति कराने वाला तथा आयु बढ़ाने वाला है, तुम इस विषय को हृदयंगम करने में समर्थ और शुद्ध हो और मैं इसका वर्णन करने में समर्थ हूँ, 


Srishti Utpatti सर्व शक्तिमान ईश्वर ने जगत रचना की।


अतः पवित्र होकर आरम्भ से वृष्णि वंश पर्यन्त परम उत्तम भूत सर्ग का वर्णन करूँगा, तदनन्तर स्वयम्भू भगवान् नारायण ने नाना प्रकार की प्रजा उत्पन्न करने की इच्छासे सबसे पहले जल की ही सृष्टि की फिर उस जल में अपनी शक्ति का आधान किया, जल का दूसरा नाम है नार क्यों कि उसकी उत्पत्ति भगवान् नर से हुई है, वह जल पूर्व काल में भगवान्का अयन हुआ इसलिये वे नारायण कहलाते हैं, भगवान ने जल मै जो अपनी शक्ति का आधान किया था उससे एक बहुत विशाल सुवर्णमय अण्ड प्रकट हुआ वह दीर्घ काल तक जल में ही स्थित था, उसी में स्वयम्भू ब्रह्माजी उत्पन्न हुए, ऐसा हमने सुना है,


Srishti Utpatti, ब्रह्मा जी की उत्पति।

भगवान् हिरण्य गर्भ ने उस अण्ड में एक वर्ष तक निवास करके उसके दो टुकड़े कर दिये फिर एक टुकड़े से धुलोक बनाया और दूसरे से भूलोक, उन दोनों टुकड़ों के बीच में भगवान् ब्रह्मा ने आकाश अवकाश की सृष्टि की, जल के ऊपर तैरती हुई पृथ्वी को स्थापित किया, फिर दसों दिशाएँ निश्चित कीं, उस ब्रह्माण्ड के भीतर ही उन्होंने काल मन वाणी काम क्रोध तथा रति आदि भावों की सृष्टि की, फिर इन भावों के अनुरूप सृष्टि करने की इच्छा वाले ब्रह्माजी ने निम्नलिखित सात प्रजापतियों को उत्पन्न किया, 


Srishti Utpatti, प्रजापतियो की उत्पत्ति।

उनके नाम इस प्रकार हैं, मरीचि अत्रि अङ्गिरा पुलस्त्य पुलह क्रतु और वसिष्ठ, महा तेजस्वी ब्रह्मा ने इन सातों की अपने मन संकल्प से सृष्टि की अतः ये उनके मानस पुत्र हैं, पुराणों में ये सात ब्रह्मा निश्चित किये गये हैं, भगवान् नारायण में मन लगाये रहने वाले इन सात ब्राह्मणों की सृष्टि के अनन्तर ब्रह्मा जी ने अपने रोष से रुद्र को प्रकट किया, फिर पूर्वजों के भी पूर्वज भगवान् सनत्कुमार जी को उत्पन्न किया, भरत नन्दन ये मरीचि आदि सात ऋषि तथा रुद्र देव प्रजा की सृष्टि करने लगे, स्कन्द और सनत्कुमार ये दोनों अपने तेज का संवरण करके रहते हैं, उक्त सात महर्षियों के सात बड़े बड़े दिव्य वंश हैं, देवता भी इन्हीं वंशों के अन्तर्गत हैं, उन सातों वंशों के लोग कर्म निष्ठ एवं संतान वान् हैं, उन वंशों को बड़े बड़े ऋषियों ने सुशोभित किया है, 


Srishti Utpatti, चार वेदों कि रचना।

इसके बाद ब्रह्मा जी ने पहले विद्युत् वज्र मेघ रोहित सीधा इन्द्रधनुष पक्षि समुदाय तथा पर्जन्य की सृष्टि की, फिर ब्रह्माजी ने यज्ञ की सिद्धि के लिये नित्य सिद्ध ऋक् यजुः और साम का आविष्कार किया, फिर ऐश्वर्य शील ब्रह्मा ने अपने मुख से देवताओं को और वक्षःस्थल से पितरो को प्रकट किया, फिर उन्होंने उपस्थेन्द्रिय से मनुष्यो को और जंघाओ से असुरो को उत्पन्न किया, तदनन्तर उन्हो ने साध्य नामक प्राचीन देवताओ को प्रकट किया ऐसा हमने सुना है,


Srishti Utpatti, मानव आदि की रचना।

इस प्रकार प्रजाकी सृष्टि रचते हुए उन आपव अर्थात् जल में प्रकट हुए प्रजापति ब्रह्मा के अङ्गो मे से उच्च तथा साधारण श्रेणी के बहुत से प्राणी प्रकट हुए, इस प्रकार वे आपव प्रजापति मानसिक प्रजाओ को रच रहे थे परंतु वे प्रजाएँ जब अधिक न बढ़ीं तब वे अपने शरीर के दो भाग कर एक भाग से पुरुष और दूसरे भाग से नारी हो गये और उस नारी ने गाय घोड़ी आदि जिस जिस रूप को धारण किया पुरुष ने उसी जाति के बैल घोड़े आदि का रूप धारण किया इस प्रकार उन्होंने उस नारी में अनेक प्रकार की मैथुनी प्रजाओ को रचा, इस प्रकार वे पुरुष और नारी अपनी महिमा से स्वर्ग और पृथ्वी पर व्याप्त हो गए, 


Srishti Utpatti, मनु और शतरूपा की उत्पति।

भगवान् विष्णुने विराट् पुरुष आपव प्रजापति या ब्रह्माकी सृष्टि की थी और विराट्ने पुरुष की उस विराट पुरुष को तुम मनु समझो और उनकी स्त्री को शतरूपा, मनु के समय को ही मन्वन्तर काल कहा गया है, आपव पुत्र मनु की जो यह दूसरी योनिज सृष्टि है यहीं से मन्वन्तर का आरम्भ बताया जाता है, इस प्रकार शक्तिशाली वैराज पुरुष मनु ने प्रजासर्ग की सृष्टि की, आपव प्रजापति को नारायण सर्ग कहा गया है क्यो कि वे नारायण से ही प्रकट हुए हैं, उनकी अयोनिजा प्रजा प्रथम सर्ग है और मनुकी योनिजा प्रजा द्वितीय सर्ग, जो इस आदि सृष्टि को इस प्रकार जान लेता है वह आयुष्मान् कीर्तिमान् धन्यवाद का पात्र संतान वान् और विद्वान् होता है उसे इच्छानुसार उत्तम गति प्राप्त होती है,






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