📚📚✒️आओ सही इतिहास पढें:- 
🤺वीरों/वीरांगनाओं की गाथा ⚔️



वीर दुर्गादास

आज हम जिनकी बात करने जा रहे हैं वे जीवन के हर स्तर पर खरे उतरे हैं। फिर चाहे वह राजनीति हो, कूटनीति हो या फिर शत्रु का संहार करने की नीति।* उन्हें हर मोड़ पर प्रथम ही पाया गया है। परन्तु निराशा इस बात की कि दुनिया ने उन्हें महज़ एक अच्छा योद्धा कहकर ही सम्मानित किया है। लेकिन इससे कई बढ़कर हैं ‘ वीर शिरोमणि दुर्गादास राठौड़’।

वे मात्र एक वीर नहीं थे, मात्र एक अच्छे योद्धा नहीं थे, अपितु इससे बढ़कर वे एक महान राजनीतिज्ञ थे जिसे दुनिया को याद रखना चाहिए। तो आइए पढ़ते हैं 'वीर शिरोमणि दुर्गादास राठौड़' के बारे में।

वीर दुर्गा दास


✍️● कौन थे वीर दुर्गादास

वीर दुर्गादास राठौड़ जी का जन्म 13 अगस्त, 1638 को ग्राम सालवा में हुआ था। उनके पिता जोधपुर राज्य के दीवान श्री आसकरण तथा माता नेतकँवर थीं।आसकरण की अन्य पत्नियाँ नेतकँवर से जलती थीं। अतः मजबूर होकर आसकरण ने उन्हें सालवा के पास लूणवा गाँव में रखवा दिया। छत्रपति शिवाजी की तरह दुर्गादास का लालन-पालन उनकी माता ने ही किया। उन्होंने दुर्गादास में वीरता के साथ-साथ देश और धर्म पर मर-मिटने के संस्कार डाले। उस समय मारवाड़ में राजा जसवन्त सिंह (प्रथम) शासक थे। एक बार उनके एक मुँहलगे दरबारी राईके ने कुछ उद्दण्डता की। दुर्गादास से सहा नहीं गया।उन्होंने सबके सामने राईके को कठोर दण्ड दिया। इससे प्रसन्न होकर राजा ने उन्हें निजी सेवा में रख लिया और अपने साथ अभियानों में ले जाने लगे। एक बार उन्होंने दुर्गादास को ‘मारवाड़ का भावी रक्षक’ कहा, पर वीर दुर्गादास सदा स्वयं को मारवाड़ की गद्दी का सेवक ही मानते थे।


✍️● औरंगजेब की नींद उड़ा कर रख दी थी वीर दुर्गादास ने

दुर्गादास अपनी इस जन्मजात निडरता के कारण ही महाराजा जसवंत सिंह का प्रमुख अंगरक्षक बन गए थे और _यही अंगरक्षक आगे चलकर उस समय संपूर्ण मारवाड़ का रक्षक बन गया था।_ जोधपुर के महाराज जसवंत सिंह के इकलौते पुत्र पृथ्वीसिंह को औरंगजेब ने षड्यंत्र रचकर जहरीली पोशाक पहनाकर मार डाला। और मुगलों की तरफ से युद्ध लड़ते हुए जसवंतसिंह काबुल में वीरगति को प्राप्त हुए। उस समय उनकी दो रानियां गर्भवती थी। इस अवसर का लाभ उठाते हुए औरंगजेब ने जोधपुर पर कब्जा कर लिया और सारे शहर में लूटपाट, आगजनी और कत्लेआम होने लगा। संकटकाल में दुर्गादास ने महाराजा जसवंत सिंह की विधवा महारानी महामाया तथा उसके नवजात शिशु (जोधपुर के भावी राजा अजीत सिंह) को औरंगजेब की कुटिल चालों से बचाया। दिल्ली में शाही सेना के सैनिकों को गाजर-मूली की तरह काटते हुए मेवाड़ के राणा राजसिंह के पास परिवार सुरक्षित पहुंचाने में वीर दुर्गादास राठौड़ सफल हो गए। इससे औरंगजेब तिलमिला उठा और उनको पकड़ने के लिए उसने मारवाड़ के चप्पे-चप्पे को छान मारा। यही नहीं उसने दुर्गादास व अजीत सिंह को जिंदा या मुर्दा लाने वालों को भारी इनाम देने की घोषणा की थी। इस बीच दुर्गादास भी मारवाड़ को आजाद कराने और अजीत सिंह को राजा बनाने की प्रतिज्ञा को कार्यान्वित करने में जुट गए थे। 


✊दुर्गादास जहां राजपूतों को संगठित कर रहे थे वहीं औरंगजेब की सेना उनको पकड़ने के लिए सदैव पीछा करती रहती थी। _बीस बरस की अथक मेहनत के बाद अंतत: जोधपुर के किले पर फिर केसरिया लहरा उठा और दुर्गादास ने अपनी चिर प्रतीक्षित प्रतिज्ञा पूरी की उन्होंने अपने हाथों से अजित सिंह का राजतिलक कर पूरा किया।_ 


👉लेकिन गद्दी पर बैठने के थोड़े समय पश्चात महाराजा अजीतसिंह ने सामंतों एवं अन्य षड्यंत्रकारों की बातों में आकर दुर्गादास को मारवाड़ से निष्कासित कर दिया।* दुर्गादास ने उनकी आज्ञा को मानते हुए यहां से प्रस्थान किया और उज्जैन में शिप्रा नदी के तट पर अपना शेष जीवन व्यतीत किया। दिनांक 22 नवम्बर सन् 1718 (माघशीर्ष शुक्ल एकादशी सम्वत् 1775) में उनका निधन हो गया। उनका अन्तिम संस्कार उनकी इच्छा के अनुसार क्षिप्रा नदी के तट पर ही किया गया।


 टिप्पणी: दुर्गादास कहीं के राजा या महाराजा नहीं थे लेकिन उनके चरित्र की महत्ता इतनी ऊंची उठ गई थी कि उनका यश तो स्वयं उनसे भी ऊंचा उठ गया था।

उन्होंने महाराजा जसवन्त सिंह द्वारा उन्हें दी गयी उपाधि ‘मारवाड़ का भावी रक्षक’ को सत्य सिद्ध कर दिखाया। उनकी प्रशंसा में आज भी मारवाड़ में निम्न पंक्तियाँ प्रचलित हैं –


 _माई ऐहड़ौ पूत जण,जेहड़ौ दुर्गादास_ 

 _मार गण्डासे थामियो,बिन थाम्बा आकास।।_ 


वीर शिरोमणि राष्ट्रवीर दुर्गादास राठौर हमारी आने वाली पीढ़ियों के लिये वीरता, देशप्रेम, बलिदान, त्याग व स्वामिभक्ति के प्रेरणा व आदर्श बने रहेंगे। राष्ट्रवीर दुर्गादास राठौर जी को हम कोटि-कोटि नमन करते हैं। 


 वन्देमातरम् , भारत माता की जय

देश के अमर बलिदानों की जय

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