Ad Code

Ticker

6/recent/ticker-posts

purana kya hai purana in hindi ved puran Puran ka Iyihash पुराण भारतीय धर्म एवं विद्याओं के चौदह स्थानों में परिगणित होने से अतीव महत्त्वपूर्ण हैं

पुराण का वेदत्व Puran ka Iyihash purana kya hai purana in hindi

पुराण भारतीय धर्म एवं विद्याओं के चौदह स्थानों में परिगणित होने से अतीव महत्त्वपूर्ण हैं । ऋषिदयानन्द की परम्परा का निर्वहन करने वाले आर्यसमाजीय विचारकों ने पुराण खण्डन के सन्दर्भ में बहुविध लिखा इसके साथ ही स्वामी श्रीकरपात्री जी एवं अन्य विद्वानों ने पुराण विषयक अनेक ग्रन्थ लिखकर पुराणों की महत्ता प्रतिपादित की। इस प्रकार खण्डन-मण्डन की इस शैली ने पुराण-साहित्य को बहुत विस्तार दिया परन्तु फिर भी पुराण का यथार्थ-स्वरूप प्रस्तुत नहीं किया जा सका, अतः इस उद्देश्य की पूर्ति को दृष्टिगत रखते हुए ही इस जगद्गुरु रामानन्दाचार्य राजस्थान संस्कृत विश्वविद्यालय में अनुसन्धान को नवीन दिशा देने के दृष्टिकोण से स्थापित विभिन्न पीठों में से एक साहित्य-पीठ के अध्यक्ष पूज्यपाद आचार्य पं. अनन्त शर्मा जी ने अपने सद् अध्यवसाय एवं गम्भीर चिन्तन से पुराण वाङ्मय पर जो कुछ लिखा वह इस प्रकृत ग्रन्थ पुराण दर्शन समग्र दृष्टि का स्वरूप है तथा पुराणों का वेदत्व' सिद्ध करने का प्रबल आधार एवं पक्षधर है। 

purana-kya-hai-purana-in-hindi-ved-puran-Puran-ka-Iyihash


ऐसे महनीय इस ग्रन्थ के सम्पादन का गुरुतर दायित्व मुझ जैसे अकिञ्चन प्राणी को सौंपा गया जो वेद को तो आपततः भी शायद ही समझ सका हो तथा पुराणों के मर्म को स्पर्श करने वालों की श्रेणी में भी पश्चाद्वर्ती सिद्ध हो सकता है परमपि आचार्यचरण पितृतुल्य पं. श्री अनन्त जी की कृपादृष्टि भवन्ति भव्येषु हि पक्षपाताः' इस भारवि के कथन को चरितार्थ करती हुई मेरे किसी पुण्योदय के अंश को अभिव्यक्त करती है, इसके लिए मैं सर्वदैव आपका अधमर्ण रहूँगा क्योंकि इससे मुझे वैदिक वाङ्मय एवं पुराण-साहित्य से निकटतया जुड़ने का अवसर प्राप्त हुआ, अस्तु। 

किसी भी ग्रन्थ का भूमिका का भाग उसके आत्मतत्त्व को प्रस्तुत करता है जिससे प्रबुद्ध पाठक वर्ग अभिप्रेरित हो सम्पूर्ण ग्रन्थ के अध्ययनार्थ उन्मुख होता है। 


पुराण का वेदत्व वेदों की रचना - Puran ka Iyihash purana kya hai purana in hindi ved puran


वेद मन्त्रों के दर्शन, रचना अथवा लिपिबद्ध होने के सम्बन्ध में इनकी अपौरुषेयता उत वा पौरुषेयता को लेकर विद्वानों में मत भेद प्रारम्भ से ही आज तक चले आ रहे हैं। ब्रह्मा के मुख से आविर्भूत तात्त्विक वेदों का दर्शन ऋतम्भरा के धनी ऋषियों ने किया अत एव कतिपय विद्वानों ने 'ऋषयो मन्त्रद्रष्टारो न तु कर्तारः' का सिद्धान्त प्रतिपादित किया। परन्तु आज के विज्ञान वाद में भौतिकवाद की पराकाष्ठा के स्पर्शमात्र से अपने आपको पण्डितम्मन्य वैज्ञानिक वेद-मन्त्रों के दर्शन की सत्यता को दूर से ही नकारने में अटूट विश्वास रखते हैं परिणाम स्वरूप वेद वेद न होकर ज्ञान के सामान्य भण्डार माने जाने लगे हैं और इसी सिद्धान्त के आधार पर सम्पूर्ण संसार के विद्वानों ने ऋग्वेद को विश्व का प्राचीनतम लिपिबद्ध ग्रन्थ स्वीकार कर अपने अहं को तुष्ट किया है। परमपि सत्यता कुछ और ही है जो इनकी स्थूल बुद्धि से परे है। इस प्रासंगिक सत्यता को समझने के लिए सूक्ष्म एवं गम्भीर चिन्तनात्मक प्रज्ञा की आवश्यकता है जो प्रायः सभी में नहीं होती। वेदों की अपौरुषेयता के इस प्रसंग में ऋषियों की सी ऋतम्भरा प्रज्ञा ही यह सुनिश्चित कर सकती है कि वेद अपौरुषेय है अथवा पौरुषेय। सामान्यतः सृष्टि के स्थूल पदार्थों की संरचना में पुरुष का बहुत बड़ा योगदान है यही कारण है कि पुरुष ने प्रकृति के समस्त पदार्थों में अपने ही पुरुषार्थ को ढूँढना प्रारम्भ कर दिया 

Salvation Kya hai?

और सृष्टि के प्रारम्भ से ही अपनी सत्ता को स्पष्टतः सम्पादित करने वाले वेदों में भी अपने ही पुरुषार्थ का अन्वेषण करते हुए उसे सिद्ध कर रहा है। परन्तु यह सत्य से कहीं परे है। अपौरुषेय रूप तात्त्विक सत्य का प्रतिपादन तो भारतीय संस्कृति में श्रद्धास्पद समस्त वर्ग करता है और इस सन्दर्भ में किसी भी तर्क की सुश्रूषा नहीं रखता परन्तु इसे सिद्ध करने में वह कोई ठोस प्रमाण प्रस्तुत करने में सक्षम भी नहीं है। इस सन्दर्भ में मेरी दृष्टि से ठोस तर्कसम्मत प्रमाण प्रस्तुत किया है जयपुर के ही वास्तव्य पुराण का वेदत्व समीक्षा-चक्रवर्ती पं. मधुसूदन ओझा जी के ही पट्टशिष्य एवं उनके दर्शन के प्रसारक, महाराज संस्कृत कॉलेज जयपुर में दीर्घकाल तक प्राचार्यत्व वहन करने वाले तथा भारत के महामहिम राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद से सर्वप्रथम सन् १९५८ में काशी के विद्वानों की सर्वसम्मति से सम्मान प्राप्त व्याख्यान वाचस्पति पं. गिरिधर शर्मा चतुर्वेदी जी ने अपने ग्रन्थ 'वैदिक विज्ञान और भारतीय संस्कृति' में। हमारे शास्त्रकारों द्वारा वाक् शक्ति के चार स्वरूप निर्धारित किये गये हैं:- परा, पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी। वाक् शक्ति के प्रथम स्वरूप 'परा' को आत्मा की मुख्य शक्ति माना गया है जिसका कोई स्वरूप निश्चित नहीं किया जा सकता? दूसरी 'पश्यन्ती' वह वाक्स्वरूप है जिसे प्रकाशरूप कहा गया है, इसमें शब्द 

और अर्थ दोनों युगपत् रूप में रहते हैं, इन दोनों का विभाग नहीं किया जा सकता यही स्वरूप वागर्थ रूप अर्धनारीश्वर शिव का रूप है। मध्यमा' स्वरूप में शब्द और अर्थ का विभाग तो हो जाता है परन्तु शब्द मन ही मन में विवर्त रूप में रहते हैं जिसे वाक्यपदीय में स्पष्ट किया है - 

विवर्ततेऽर्थभावेन प्रक्रिया जगतो यतः। Puran ka Iyihash purana kya hai purana in hindi ved puran

ऐसी स्थिति में कण्ठ, तालु आदि का कोई व्यापार नहीं होता अतः उन शब्दों को कोई सुन नहीं सकता। लोक में ऐसी स्थिति को मन ही मन में अथवा स्वयं से बात करना कह सकते हैं। आत्मा ने ऋषियों पश्यन्ती और मध्यमा वाणी में ही वेदों को प्रकट किया और उन्होंने वैखरी, वाणी द्वारा शिष्य प्रशिष्यों में प्रचारित किया। 

वाक् शक्ति के इस विवेचन से सिद्ध हो जाता है कि वेद अपौरुषेय हैं जो ऋषियों की पश्यन्ती और मध्यमा वाणी में आविर्भूत हुए अतः इनकी अपौरुषेयता के विषय में सन्देह की कोई गुंजाईश नहीं है। 

Varshik Rashifal 2021 in hindi

Post a Comment

0 Comments